Sahityayan

Tuesday, 18 February 2014

कुछ चुने हुए मुक्तक

चुने  हुए मुक्तक

"अटल हों गर इरादे तो खुदाई साथ चलती है
उम्मीदों की शमा बेख़ौफ़ तूफानों में जलती है
ये मायूसी की चादर से निकल बाहर ज़रा देखो
अँधेरी रात के दिल में सुनहरी धूप पलती है"।
--- समीर परिमल

 पलकों पे आंसुओं को सजाने में रह गए।
हम जिंदगी का बोझ उठाने में रह गए,
हम महफ़िलों में आपकी आये तो थे मगर,
 दामन फटा हुआ था छुपाने में रह गए ।
-- कृष्ण कुमार बेदिल
( मेरठ , उ प़ )

डोर ज़िन्दगी की उलझाये हुए है वो रब
कठपुतलियो की तरह नचाये फिरता है
इक तागा खींचे तो खुशनुमा है ज़िन्दगी
इक तागे में जैसे कोई दर्द निकलता है.।
-- मानव शिवि मेहता
( टोहाना , हरियाणा )

लोकतंत्र की जननी जनता न्यारी है
जान  रही किसमेँ कितनी मक्कारी है
कुहरा,बादल और अँधेरा एक हुए,
सच का सूरज ढकने की तैयारी है ।।
- -- उमा प़साद लोधी
( बहराइच , उप़ )

रूप,धन, रुतबा ,प्रतिष्ठा हैं मिले सब जिनको
ग़म की इक चोट से जीवन को मिटा देते हैं
एक हम हैं कि ग़मों से ही घिरे हैं हर पल
फिर भी जीते हैं औ जीने का मज़ा लेते हैं ।
-- लक्ष्मी शंकर वाजपेयी
( नई दिल्ली )

.नजर पड़ी तो पड़ी रह गयी
.तनिक लड़ी तो लड़ी रह गयी
हिला नहीँ मैँ अपने दर से
वह बौरी सी खड़ी रह गयी ।।.......
...उमा प्रसाद लोधी

ये करिश्मा मोहब्बत में होते देखा
लब पे हँसी, आँख को रोते देखा
गुजरे हैं मंज़र भी अज़ब, आँखों से
साहिल को कश्तियाँ डुबोते देखा
© लोकेश नदीश
( जबलपुर ,म प्र )

वो मसीहा है अजब कैसी सज़ा देता है
दर्द देता है कभी हम को दवा देता है
उस की सहमत का नहीं कोई ठिकाना लोगो
रोने वालों को भी पल भर में हँसा देता है  ।
-- प्रकाश सूना

ज़ख्मे- दिल की चुभन खो गई
बात आई - गई हो गई
आपका आसरा क्या मिला
ज़िन्दगी, बन्दगी हो गई
-दीक्षित दनकौरी
( दिल्ली )

इस बस्ती में बड़े अभागे रहते
जो रोटी के ख़ातिर मीलों चलते
कुछ ऐसे अमीर भी यहाँ निवासी
जो अपच पचाने को  मीलों चलते  ।
सुधेश
( दिल्ली )