Sahityayan

Monday, 14 April 2014

एक लेखिका की संकीर्णता



एक  लेखिका की संकीर्णता 

अरुन्धती राय भारत की अंग्रेज़ी लेखिका है । विदेशों में उन्हें लेखिका के रूप गिने चुने लोग जानते होंगे ,पर
भारत में लेखिका से अधिक उन्हें एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्ति के रूप में जाना जाता है । उन्हें भारत 
विरोधी प्रचार में बड़ी महारत हासिल है । उन के अनेक वक्तव्य संकीर्णता  के दर्पण हैं । कुछ जागरूक
लोगों की उन के बारे मेँ ये टिप्पणियाँ देखिये जो फेसबुक से साभार ली गई हैंं ।
---डा सुधेश 


विडम्बना ही है कि अरुंधती राय अम्बेडकर के हक में ऐसे पेश आ रही हैं जैसे अब तक देश ने बाबा साहेब को पहचाना ही न था। और महात्मा गांधी को ऐसे दुत्कार रही हैं जैसे उनसे बुरा शख्स देश ने देखा न था! तो क्या दो महान हस्तियों को हम अब अरुंधती राय की समझ (!) से समझें?
अरुंधती राय की अजीबोगरीब स्थापना यह है कि "गांधी ने अम्बेडकर के हर कदम पर रोड़ा अटकाया" (Gandhi thwarted Ambedkar at every step)। अम्बेडकर की एक बहुत पुरानी किताब Annihilation of Caste (जाति का उन्मूलन) के नए संस्करण की अपनी लम्बी भूमिका में गांधीजी को वे यों सम्बोधित करती हैं: "जिन्हें अक्सर हिंदुओं में सबसे महान कहा जाता है .." (the man who is often called the “greatest of Hindus” …) हिंदुओं में महान? देश को 'हिन्दु-स्थान' की जगह 'भारत' बनाए रखने के लिए एक हिन्दू की गोली खाने के बाद भी महज हिंदुओं में सबसे महान? संसार छोड़िए, भारतवासियों में भी नहीं? 
आइंस्टाइन ने क्या किसी "हिन्दू" के लिए कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को शायद ही भरोसा होगा ऐसा कोई मानव धरती पर कभी पैदा भी हुआ था? हम प्रमाणों के साथ देखते आए हैं कि गांधीजी ने आराम की जिंदगी छोड़ी, कोई संपत्ति नहीं जोड़ी, विलायत तक अधनंगे फकीर कहलाए, नेताओं को सेवक कह गरीब से गरीब का हित साधने का 'तलिस्मा' देते रहे, अहिंसा-सत्याग्रह-स्वराज-मानवता के अनूठे मन्त्रों को जी कर बताया। उनके बारे में अरुंधती कहती हैं: जैसा कि गांधीजी ने "चाहा", उसके अनुरूप दौलत अमीरों के कब्जे में रह गई (As Mahatma Gandhi desired, the rich man has been left in possession of his (as well as everybody else's) wealth.) क्या सचमुच गांधीजी ने ऐसा "चाहा"?
और उन लोगों को भी देखिए, जो अम्बेडकर को ऊँचा बताने के लिए गांधी को गिराना जरूरी समझते हैं! भले यह हास्यास्पद उपक्रम हो पर, कहना न होगा, ऐसा कर वे किसी को ऊपर नहीं उठा रहे, खुद को ही नीचे गिरा रहे हैं।
-- ओम थानवी 
( दिल्ली ) 

मजे की बात, अरुन्धति को केरल में तो कोई घास तक नहीं डालता, यहाँ के साम्यवादी उसे थोथा साम्यवादी कहते हैं, और दिल्ली के लहालोट हुए जा रहे है
--सति सक्सेना 

गांधी  सब आलोचनाओं के रहते बौने न बन सके ,यद्यपि बौने लोगों ने नाम के लालच में कुतर्कों के सहारे उनके क़द को नापने की असफल कोशिश की । मैंने हंसराज रहबर की गांधी आलोचना भी पढ़ी है ,शायद पुस्तक नाम है गांधी पर मुक़दमा ? उसमें भी रहबर अपनी कुंठाएँ से पार नहीं पा पाते ,गांधी और ऊँचा उठते हैं । अरुन्धती तो हैं ही उस अंग्रेज़ी लेखक पीढ़ी की जो अंग्रेज़ी नज़रिए से भारत दर्शन कराता है दुनिया को ,कि भारत की ऊँचाइयाँ भी बौनी नजर आऐं । क्या कारण है कि न तो अंबेडकर ,और न ही जिन्ना ,तमाम कोशिशों के बाद भी ,संसार की दृष्टि में भी वह ऊँचाई छू तक न सके ,जहाँ गांधी मुस्कुराते खड़े हैं ।
--आदर्श प्रकाश 

अरुंधती राय जैसे चर्चा के भूखे तथाकथित सतही बौद्धिकों के लिये गांधी जैसी अपने समय के बहुत आगे चलने वाली सख्शियतों को समग्रता मे पहचानना संभव नही है।गांधी को आईस्टीन और टाल्सटाय सरीखे गहरी समझ वाले महान लोग ही ठीक से समझ सकते हैं.... अरुंधती से ज्यादा तो शायद बराक ओबामा और अयातुल्लाह खुमैनी ने गांधी को समझा है जो एक दूजे के दुश्मन होकर भी गांधी नाम की सख्शियत के मुरीद हैं।..गांधी एक ऐसा विचार है जिसे कोई भी गाली देने के लिये आजाद है..अरुंधती से भी हम कोई खास सकारात्मक उम्मीद नही कर सकते।
--- राकेश कुमार पालीवाल